HH Samyameendra Teertha Swamiji’s Chaturmas 2018 Vilambi Samvatsara

HH Samyameendra Teertha Swamiji’s Chaturmas 2018 Vilambi Samvatsara

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NOTE : – Above list is based on the information available. Please confirm before you use them. Errors and omissions possible.

 

 

    H.H. Samyameendra Teertha Swamiji’s Programme Schedule

    H. H. Samyameendra Teertha Swamiji’s Programme Schedule 2018

      Guru Paduka Puja ( Courtesy: K N Ramesh Bhat, Kochi)

      Five sacred things

      *पाँच वस्तु ऐसी हे ,जो अपवित्र होते हुए भी पवित्र है….*
      .
      .
      .
      उच्छिष्टं शिवनिर्माल्यं
      वमनं शवकर्पटम् ।
      काकविष्टा ते पञ्चैते
      पवित्राति मनोहरा॥

      *१. उच्छिष्ट — गाय का दूध ।*
      गाय का दूध पहले उसका बछड़ा पीकर उच्छिष्ट करता है।फिर भी वह पवित्र ओर शिव पर चढ़ता हे ।

      *२. शिव निर्माल्यं -*
      *गंगा का जल*
      गंगा जी का अवतरण स्वर्ग से सीधा शिव जी के मस्तक पर हुआ । नियमानुसार शिव जी पर चढ़ायी हुई हर चीज़ निर्माल्य है पर गंगाजल पवित्र है।

      *३. व*पाँच वस्तु ऐसी हे ,जो अपवित्र होते हुए भी पवित्र है….*
      .
      .
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      उच्छिष्टं शिवनिर्माल्यं
      वमनं शवकर्पटम् ।
      काकविष्टा ते पञ्चैते
      पवित्राति मनोहरा॥

      *१. उच्छिष्ट — गाय का दूध ।*
      गाय का दूध पहले उसका बछड़ा पीकर उच्छिष्ट करता है।फिर भी वह पवित्र ओर शिव पर चढ़ता हे ।

      *२. शिव निर्माल्यं -*
      *गंगा का जल*
      गंगा जी का अवतरण स्वर्ग से सीधा शिव जी के मस्तक पर हुआ । नियमानुसार शिव जी पर चढ़ायी हुई हर चीज़ निर्माल्य है पर गंगाजल पवित्र है।

      *३. वमनम्—*
      *उल्टी — शहद..*
      मधुमख्खी जब फूलों का रस लेकर अपने छत्ते पर आती है , तब वो अपने मुख से उस रस की शहद के रूप में उल्टी करती है जो पवित्र कार्यों मे उपयोग किया जाता है।

      *४. शव कर्पटम्— रेशमी वस्त्र*
      धार्मिक कार्यों को सम्पादित करने के लिये पवित्रता की आवश्यकता रहती है , रेशमी वस्त्र को पवित्र माना गया है , पर रेशम को बनाने के लिये रेशमी कीडे़ को उबलते पानी में डाला जाता है ओर उसकी मौत हो जाती है उसके बाद रेशम मिलता है तो हुआ शव कर्पट फिर भी पवित्र है ।

      *५. काक विष्टा— कौए का मल*
      कौवा पीपल पेड़ों के फल खाता है ओर उन पेड़ों के बीज अपनी विष्टा में इधर उधर छोड़ देता है जिसमें से पेड़ों की उत्पत्ति होती है ,आपने देखा होगा की कही भी पीपल के पेड़ उगते नही हे बल्कि पीपल काक विष्टा से उगता है फिर भी पवित्र है।
      मनम्—*
      *उल्टी — शहद..*
      मधुमख्खी जब फूलों का रस लेकर अपने छत्ते पर आती है , तब वो अपने मुख से उस रस की शहद के रूप में उल्टी करती है जो पवित्र कार्यों मे उपयोग किया जाता है।

      *४. शव कर्पटम्— रेशमी वस्त्र*
      धार्मिक कार्यों को सम्पादित करने के लिये पवित्रता की आवश्यकता रहती है , रेशमी वस्त्र को पवित्र माना गया है , पर रेशम को बनाने के लिये रेशमी कीडे़ को उबलते पानी में डाला जाता है ओर उसकी मौत हो जाती है उसके बाद रेशम मिलता है तो हुआ शव कर्पट फिर भी पवित्र है ।

      *५. काक विष्टा— कौए का मल*
      कौवा पीपल पेड़ों के फल खाता है ओर उन पेड़ों के बीज अपनी विष्टा में इधर उधर छोड़ देता है जिसमें से पेड़ों की उत्पत्ति होती है ,आपने देखा होगा की कही भी पीपल के पेड़ उगते नही हे बल्कि पीपल काक विष्टा से उगता है फिर भी पवित्र है।

      Classic Pic -Srimad Sukrathindra Tirtha Swamiji of Sri Kashimath Samsthan with Sri Gokarn Parthgali Math Samsthan Swamijis – Sri Indirakanth Teerth Swamiji and Sri Kamalanath Teerth Swamiji

      Rare pictures of three Swamijis (Ramnathi, Goa, April 2018)

      NAIVEDYAM: WILL GOD EAT OUR OFFERINGS NNNNNN

      Here is a very good explanation about Neivedyam to God. Will God come and eat our offerings? Many of us could not get proper explanation from our elders. An attempt is made here. A Guru-Shishya conversation: The sishya who doesn’t believe in God, asked his Guru thus: “Does God accept our *’neivedhyam’* (offerings)? If God eats away the *’prasadham’* then from where can we distribute it to others? Does God really consume the ‘prasadham’, Guruji?” The Guru did not say anything. Instead, asked the student to prepare for classes. That day, the Guru was teaching his class about the ‘upanishads’. He taught them the *’mantra’* : *”poornamadham,* *poornamidham,* *poornasya poornaadaaya….”* and explained that : *’every thing came out from “Poorna or Totality.”* ( Ishavasya upanishad ). Later, Everyone was instructed to practice the mantra byheart. So all the boys started praciting. After a while, The Guru came back and asked that very student who had raised his doubt about Neivedyam to recite the mantra without seeing the book, which he did. Now the Guru gave a smile and asked this particular shishya who didn’t believe in God : ‘Did you really memorize everything as it is in the book? The shishya said : “Yes Guruji, I’ve recited whatever is written as in the book. The Guru asked: “If you have taken every word into your mind then how come the words are still there in the book? He then explained: The words in your mind are in the *SOOKSHMA STHITI* (unseen form) The words in the book are there in the *STOOLASTHITI* (seen). *GOD* too is in the *’sooksma sthiti’.* The offering made to Him is done in *’stoola sthiti’.* Thus, God takes the food in *’sookshmam’*, in *sookshma stithi.* Hence the food doesn’t become any less in quantity. While GOD takes it in the *”sookshma sthiti”,* We take it as *’prasadam’* in *’sthoola sthiti’.* Hearing this the sishya felt guilty for his disbelief in God and surrendered himself to his GURU. When Bhakti enters Food, Food becomes *Prasad…* When Bhakti enters Hunger, Hunger becomes a *Fast…* When Bhakti enters Water, Water becomes *Charanamrit…* When Bhakti enters Travel, Travel becomes a *Pilgrimage…* When Bhakti enters Music , Music becomes *Kirtan…* When Bhakti enters a House, House becomes a *Temple…* When Bhakti enters Actions, Actions become *Services…* When Bhakti enters in Work, Work becomes *Karma…* When Bhakti enters a Man, Man becomes *Human…*  NNNN

        Guru Vs Teacher.What an explanation

        Guru Vs Teacher.What an explanation!!!!!!!!!

        Difference between a Guru and a Teacher!!!!!!!

        1. A teacher takes responsibility for your growth.

        A Guru makes you responsible for your growth.

        2.A teacher gives you things you do not have and require.

        A Guru takes away things you have and do not require.

        1. A teacher answers your questions.

        A Guru questions your answers.

        1. A teacher requires obedience and discipline from the pupil.

        A Guru requires trust and humanity from the pupil.

        1. A teacher clothes you and prepares you for the outer journey.

        A Guru strips you and prepares you for the inner journey.

        1. A teacher is a guide on the path.

        A Guru is a pointer to the way.

        1. A teacher sends you on the road to success.

        A Guru sends you on the road to freedom.

        1. A teacher explains the world and its nature to you.

        A Guru explains yourself and your nature to you.

        1. A teacher gives you knowledge and boosts your ego.

        A Guru takes away your knowledge and punctures your ego.

         

        1. A teacher instructs you.

        A Guru constructs you.

         

        1. A teacher sharpens your mind.

        A Guru opens your mind.

        1. A teacher reaches your mind.

        A Guru touches your spirit.

        1. A teacher instructs you on how to solve problems.

        A Guru shows you how to resolve issues.

        1. A teacher is a systematic thinker

        A Guru is a lateral thinker.

        1. One can always find a teacher.

        But a Guru has to find and accept you.

        1. A teacher leads you by the hand.

        A Guru leads you by example.

        17.When a teacher finishes with you, you celebrate.

        When a Guru finishes with you, life celebrates.

        Let us honor both, the teachers and the Guru in our lives…

        कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।

        *कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।*

        *आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।।*

        *पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।*

        *देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।।*

        *देवताभ्यः पितृणां हि पूर्वमाप्यायनं शुभम्।*

                             अर्थात्

        समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धनधान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।

              पित्र नारायण देव की जय

        पितृपक्ष 

        सर्व वेदवेत्या गुरुजनांना वंदन करुन पितृपक्ष या विषयी थोडि माहिती जाणून घेवु.श्रध्देने जे केले जाते त्याला श्राध्द अशी संज्ञा शास्त्रकारांनी दिली आहे.

        मृतव्यक्तींच्या उद्देशाने प्रतिवर्षी जे करतो त्याला सांवत्सरीक श्राध्द अशी संज्ञा आहे.पितृपक्षात जे श्राध्द करतात त्याला महालय श्राध्द अशी संज्ञा आहे.

        आपले आकाश हे 360अंश कल्पलेले असुन. सूर्य हा सहाव्या राशीत म्हणजेकन्याराशीत गेल्यानंतर तो वृश्चिक राशीत जाण्यापर्यंतचा काऴ जो जवऴपास दोन महिने असतो तो पर्यंत महालय श्राध्द करता येते.

        भाद्रपद कृ.1 ते भाद्रपद अमावास्या या कृष्णपक्षात महालय श्राध्द रोज करावे असे वचन आहे.सांप्रत सलग 15 दिवस श्राध्द करणे हे व्यावहारीक दृष्ट्या थोडे कठिण असल्याने वडिलांच्या निधन तिथीस किंवा अमावास्येला महालय श्राध्द एकदाच केले जाते. हा हि पक्ष मान्य आहे.

        सांवत्सरीक श्राध्दात त्रयीलाच उद्देशुन पिंडदान केले जाते (आई आजी पणजी किंवा वडिल आजोबा पणजोबा) परंतु महालय श्राध्दात सर्व नातेवाईकांना पिंडदान केले जाते.

        पितृत्रयी  –वडिल आजोबा पणजोबा

        मातृत्रयीआई आजी पणजी

        मातामहत्रयीआईचे वडिल आजोबा पणजोबा

        मातामहित्रयीआईची आई आजी पणजी

        सापत्न मातु: –सावत्र आई

        पत्नीपत्नी निवर्तली असेल तर 

        पुत्रउपनयन झालेला पुत्र गेला असेल तर 

        दुहिताविवाहित कन्या निवर्तली असेल तर 

        पितृव्यसख्खे काका (काकू गेली असेल तर सपत्नीक असा उल्लेख करावा. चुलत भाउ गेला असेल तर ससूत असा सोबत उल्लेख करावा)

        मातुलसख्खा मामा (मामी गेली असेल तर सपत्नीक मामेभाउ गेला असेल तर ससूत असा उल्लेख करावा)

        भ्रातु: –सख्खा भाउ  (भावजय गेली असेल तर सपत्नीक असा उल्लेख करावा

        पितृभगिनीसख्खी आत्ये (आत्येचे यजमान गेले असतील तर सभर्तृ असा उल्लेख करावा आत्येभाउ गेला असेल तर ससूत असे म्हणावे)

        मातृभगिनीसख्खी मावशी (यजमान गेले असतील तर सभर्तृ  मावसभाउ गेला असेल तर ससूत असा उल्लेख करावा)

        आत्मभगिनीसख्खी बहिण (तीचे यजमानहि निवर्तले असतील तर सभर्तृ असे संबोधावे)

        श्वशुर  –सासरे (सासूबाई निवर्तल्या असतील तर सपत्नीक असे म्हणावे)

        गुरुज्यांनी गायत्री उपदेश केला ते (वडिलांनी मुंज लावली असेल तर वडिल) अन्य कोणी मुंज लावली असेल तर ते गुरु.

        आचार्यगुरुज्यांनी विद्या शिक्षण दिले 

        शिष्यआपला विद्यार्थी

        आप्तवरील नावांमध्ये ज्यांचा उल्लेख नाहि परंतु ज्यांचे आपल्याशी आपुलकीचे संबध होते ज्यांचे आपल्यावर उपकार आहेत या सर्वांना आप्त या संज्ञेत पिंडदान करु शकतो.

        सर्व मृत नातेवाईंकांची नाव गोत्रासहित एका वहित नोंद ठेवावी पुरोहितांच्या सल्यानुसार वरील प्रमाणे सुसुत्रीत यादि बनवावी.

        या शिवाय चार धर्मपिंडांची योजना महालयात केली आहे.

        मित्र, सखा, पशू, वृक्ष, जाणतेपणी अजाणतेपणी ज्यांनी आपल्यावर उपकार केले त्यांचाकरता.जे आपल्याकडे आश्रीत होते त्यांचा करताहि धर्मपिंड आहे.

        मातृवंशात, पितृवंशात गुरुंच्या वंशात किंवा अाप्तबांधवात ज्यांना संतती नसल्याने पिंडदान होत नाहिये त्यांचाकरता ज्यांचे क्रियाकर्म झाले नाहि.जे जन्मताच अंध, पंगु जन्मले त्यांचा करता विरुपांकरता हि धर्मपिंड अाहे.

        जे कुंभीपाक नामक नरकात पाप कर्मापुऴे खितपत पडले आहेत त्यांचाकरताहि धर्मपिंड आहे.

        असे चार धर्मपिंड महालयात दिले जातात.

        महालय श्राध्द किती प्रकारात करता येईल? कारण अनेक श्रद्धावान आस्तिक असतात परंतु नोकरीमुऴे किंवा धावपळीमुऴे त्यांना काहिवेळा थोड कठिण होत त्यांचा करता 

        दोन किंवा पाच ब्राह्मण, किंवा चटावर दर्भबटू ब्राह्मण योजना करुन श्राध्दस्वयंपाक करुन सपिंडक महालय

        आमान्न म्हणजे शिधा सामग्री योजना करुन आमश्राध्द

        दूध, केऴ, अल्पोपहार यांची योजना करुन हिरण्यश्राध्द यात पिंडदान नसते

        ब्रह्मार्पणदोन, पाच ब्राह्मण सवाष्ण कोणी गेली असेल तर सवाष्ण (सुवासिनी) पूजन करुन अन्नसंतर्पण यात पिंडदान नसते.

        एखाद्याची आर्थीक स्थिती नसेल किंवा मनुष्यबऴ वयोमानानुसार कमी असेल तरशमीपत्राअेवढा पिंड दिलेलाहि शास्त्र संमत आहे.शमीपत्र हे भाताच्या शिताअेवढेच असते.

        यातील काहिच जमत नसल्यास घोर वनात जावुन दक्षिणेकडे तोंड करुन उभे राहुन आपल्या दोन्हि काखा वर करुन माझी आर्थीक स्थिती नसल्याने मी पिंडदान किंवा पितरांचे श्राध्द करु शकत नाहि या बद्दल क्षमायाचना करुन पितरांचे स्मरण केले तरी श्राध्द होते.

        श्राध्दात विकिर प्रकीर असे दोन भाग दिले जातात .

        अग्निदाह झालेले किंवा अग्निदग्ध झालेले गर्भस्त्रावात मृत झालेले ज्यांना रुपहि प्राप्त झालेले या सर्वांनाहि अेक भाग श्राध्दात महालयात दिला जातो.

        ज्या देवतांना सोमभाग मिऴत नाहि त्यांना हि अेक भाग श्राध्दात दिला जातो.

        रामचंद्रानी वनात असताना दशरथ राजाला कंदमुऴाचे पिंड दिले होते असाहि उल्लेख रामायणात आहे.

        कन्याराशीत सूर्य गेल्यावर तुळ राशीत सूर्य असेपर्यंत तो पृथ्वीच्या बराच जवऴ असतो.पितृगणांकरता दिलेले कव्य (अन्न भाग) हा सर्वप्रथम सूर्यमंडलात जातो तिथुन तो चंद्रमंडलात जातो. चंद्रमंडल हे स्वयंप्रकाशीत नसुन सूर्यनारायणांची सुषुम्ना नाडि या चंद्र मंडलाला प्रकाशीत करते दर महिन्याच्या अमावास्येला चंद्रमंडल सूर्यमंडल एकत्र येत असते त्यामुऴे अमावास्येला पितरांना दिलेले अन्न अधीक जलद गतीने त्यांना प्राप्त होते.

        कन्याराशीच्या 10 अंशापासून ते तुळ राशीच्या 10 अंशापर्यंतच काळात सूर्य पृथ्वी या दरम्यानच्या अंतर सर्वात कमी असते त्यामुऴे पितरांना दिलेला कव्यभाग (अन्न) पितरांपर्यंत लवकर पोचते.

        श्राध्द हि व्यवस्था मनीऑर्डर प्रमाणे जाणावी.उदा.मी वेंगुर्ला पोस्ट ऑफीस मधे 500 रु.अेक नोट मुंबईला भावाकडे पाठवली तर माझ्या भावाला मुंबईत तीच नोट मिऴेल का? नाहि ना.त्याला त्या पोस्टात उपलब्ध असलेले पाचशे रु.मुल्याचे चलन मिऴेल (100 च्या पाच नोटा मिऴतील किंवा 50 च्या दहा नोटा मिऴतील) पण चलन तेवढेच मिऴेल.तद्वत आपण जे अन्न पितरांच्या उद्देशाने देतो त्याच वेऴी तेवढच अन्न 

        आपल्या पुर्वजांनी ज्या योनीत जन्म घेतला असेल त्या योनीला आवश्यक जो आहार असेल त्या रुपाने मिऴते.

        आता श्राध्दात पितर खरेच जेवतात का? हा हल्लीचा फार मोठा प्रश्न आहे.

        आपण जेव्हा श्राध्दान्न जेवतो तेव्हा ते कितीहि अल्प जेवले तरी शरीराला एक प्रकारची सुस्ती जडपणा अनुभवता येतो.परंतु एखाद्या यज्ञ किंवा मंदिरात कितीहि भरपेट प्रसाद घेतला तरी सुस्ती जडपणा जाणवत नाहि मंदिरातील प्रसादात कांदालसूण, गरममसाले वगैरे काहि नसल तरी तो चवीला सुमधुरच लागतो  कारण त्या अन्नावर भगवंताची कृपा असते श्राध्दान्नावर पितरांचीआसक्तीअसते.त्यामुऴे शरीराला जडत्व येत.एरवी खीर वडे खाल्ले तर सुस्ती येत नाहि.

        हा अनुभव घ्यायला हरकत नसावी.स्वयंपाक हा घरीच केलेला असावा.भरपुर प्रकार केले नाहित तरी चालेल परंतु सात्विक पणे आपल्या पूर्वजांना आपल्या हातचे दिलेले अन्न हे अधीक प्रिय असते.त्यातली आपुलकी कृतज्ञता हॉटेल किंवा कँटरींगच्या अन्नाला कधीच येणार नाहि.सूनांनी, लेकींनी केलेला वरणभात हा आई वडिलांना  पंचपक्वानांपेक्षा अधीक प्रिय असतो हे सदैव ध्यानात ठेवावे

        पितृपक्षात आपल्या पूर्वजांविषयी कृतज्ञता व्यक्त करुन त्यांना संतुष्ट करुन त्यांचे आशीर्वाद घ्यावेत

        वरील माहितीत काहि न्युन असेल तर क्षमस्व

        वे.भूषण दिगंबर जोशी वेंगुर्ले

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